पत्रांक :- 16/ क21/505
दिनांक :- 30/06/2025
*परिणाम*
सातवे *श्री मनोहर सिंह यादव* स्मृति *सृजन श्री अलंकरण* – 2025 हेतु आयोजित *सृजन परंपरा गीत की* नामक *गीत सृजन प्रतियोगिता*
*प्रथम चरण*
*प्रथम माह* ( जून 2025)
के विषय :- *बीते दिन बीती रातें* हेतु प्राप्त गीतों के मूल्यांकन के पश्चात प्राप्त परिणाम
*प्रथम स्थान :- कोड ज*👇
तुम आए हो इस पतझड़ में
*द्वितीय स्थान :- कोड ङ*👇
जिससे मिलना हो न कभी अब
*तृतीय स्थान :- कोड ट* 👇
सुनो शुभे ! अब लौट चलें हम
__________________________________________
*प्रथम स्थान कोड – ज*
तुम आये हो इस पतझड़ में यौवन का मधुमास लिए।
हम पनघट से लौट रहे हैं अपनी अनबुझ प्यास लिए।।
बिन बोले सब कह जाता है मौसम का आना-जाना,
जीवन भर बुनता रहता मन सपनों का ताना-बाना,
गिर-गिर कर उठते रहते हैं एक नया विश्वास लिए।।
तेरी राह निहार थके हैं दो नैना पथराए से,
पता नहीं कब क्या हो जाये रहते है घबराए से,
*बीते दिन बीती रातें* हम जीते है इक आस लिए।।
कितनी बार पुकारा हमने सूरज चाँद सितारों को, ललचाई नजरों से देखा जाते मस्त बहारों को,
मुट्ठी भर धरती के बदले तुम आये आकाश लिए।।
✍️ श्री सुभाष चन्द्र यादव
1743, अशोक नगर, संस्कृति पब्लिक स्कूल के सामने, रानीडीहा, खोराबार, गोरखपुर (उ.प्र.)
पिन- 273010
मो.-93042709
*द्वितीय स्थान कोड – ङ*
¶ जिससे मिलना हो न कभी अब, यादों में नित पाता हूंँ ।
बीते दिन बीती रातें मैं, फिर भी वे स्वप्न सजाता हूंँ ।।
नहीं स्वप्न में भी जो संभव, गीत उसी का गाता हूंँ ।
बीते दिन बीती रातें मैं, फिर भी वे स्वप्न सजाता हूंँ ।।
¶ जिसे भूलना चाहूँ जितना, याद उसी की आती है ।
याद वही फिर दर्द बढ़ाकर, और अधिक तड़पाती है ।।
मृगतृष्णा के भ्रमित – पंथ पर, भटक – अटक रह जाता हूँ ।
बीते दिन बीती रातें मैं, फिर भी वे स्वप्न सजाता हूंँ ।।
¶ उसकी एक झलक पाने को, मन व्याकुल हो जाता है ।
शायद यह पागलपन ही तो, सच्चा प्रेम कहाता है ।।
कर उसकी अनुभूति अनोखी, अब मन को बहलाता हूंँ ।
बीते दिन बीती रातें मैं, फिर भी वे स्वप्न सजाता हूंँ ।।
¶ प्रत्याशा के बिना समर्पण, परम प्रेम कहलाता है ।
बस उसके संवेदन से ही, मन प्लावित हो जाता है ।।
सोच – सिंधु में अब तो हरपल, डूब – डूब उतराता हूंँ ।
बीते दिन बीती रातें मैं, फिर भी वे स्वप्न सजाता हूंँ ।।
¶ थाह नहीं है जिसका कोई, वह दुख – दरिया पाया है ।
डूब गया हूंँ उस प्याले में, जो मधुपान कराया है ।।
कौन मिटाए भाग्य – लेख को, सोच यही रह जाता हूंँ ।
बीते दिन बीती रातें मैं, फिर भी वे स्वप्न सजाता हूंँ ।।
*भरत नायक ‘बाबूजी’*
लोहरसिंह, रायगढ़ (छ.ग.)
पिन – 496100
मोदी. – 9340623421
****************************************
*तृतीय स्थान कोड – ट*
गीत
——————-
सुनो शुभे! अब लौट चले हम
अपनी प्रेम नगरिया रे……
ये दुनियाँ तो भूल चुकी है
प्रेम ग्रंथ की भाषा भी
बैर निभाना सीख रहे सब
दिखती घोर निराशा भी
दम घुटता है राजमहल में
सुख को लगी नजरिया रे…..
हम तो है मीरा के वंशज
छोड़ चलें घर आँगन सब
मस्त फकीरी में जी लेंगे
क्या पतझड़ क्या सावन अब
काले बादल निठुर हुये है
बरसे नहीं बदरिया रे…….
बीते दिन बीती रातें सब
हमको अब याद नहीं करना
हम तो प्रेम उपासक ठहरे
जग से फ़रियाद नहीं करना
पल भर का साथ तुम्हारा प्रिय
लगता सकल उमरिया रे…..
सुनो शुभे! अब लौट चले हम
अपनी प्रेम नगरिया रे……
राघव दुबे ‘रघु’
महावीर नगर, इटावा,
उत्तर प्रदेश 206003
8439401034
आधिकारिक हस्ताक्षर
*प्रोफेसर अजिर बिहारी चौबे*
उपनिदेशक मूल्यांकन/ मुख्य निर्णायक
मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष ,एस.आर.के. स्नात्कोत्तर महाविद्यालय फिरोजाबाद ।
*सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं*
अधिक जानकारी के लिए क्लिक करें
या
https://www.facebook.com/pragyahindifzd/
*प्रेषक*
*कृष्ण कुमार “कनक”*
संस्थापक/प्रबंध-सचिव
प्रज्ञा हिंदी सेवार्थ संस्थान ट्रस्ट
मो. 7017646795
*मृदुल माधव पाराशर*
प्रतियोगिता प्रभारी
मो. 9528755955
*गौरव चौहान गर्वित*
संस्थापक सचिव
मो.9412500858
*प्रवीण पाण्डेय*
ट्रस्ट उपाध्यक्ष
मो. 9808406844
*कुँ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह जादौन*
सहनिदेशक- साहित्य
मो. 9897807132
*आकाश यादव*
मुख्य व्यवस्थापक
मो. 8791937688
*मुकुल पाराशर*
मुख्य निदेशक
मो. 9411464129
*यशपाल यश*
ट्रस्ट अध्यक्ष
मो.9837812637
*सचिन कुमार बघेल*
ट्रस्ट कोषाध्यक्ष
मो. 8077069829