पत्रांक :- 16/ क21/507
दिनांक :- 30/07/2025
*परिणाम*
सातवे *श्री मनोहर सिंह यादव* स्मृति *सृजन श्री अलंकरण* – 2025 हेतु आयोजित *सृजन परंपरा गीत की* नामक *गीत सृजन प्रतियोगिता*
*प्रथम चरण*
*द्वितीय माह* ( जुलाई 2025)
के विषय :- *कंचन कलश* हेतु प्राप्त गीतों के मूल्यांकन के पश्चात प्राप्त परिणाम
*प्रथम स्थान :- कोड आ*👇
चंचला चंद्रिका स्वर्ग की अप्सरा
*द्वितीय स्थान :- कोड ए*👇
एक मंत्र पढ़कर लिखी पत्रिका
*तृतीय स्थान :- कोड ऊ* 👇
अनाचार और कटु वचनों से
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*प्रथम स्थान* कोड – आ
चंचला, चन्द्रिका, स्वर्ग की अप्सरा l
दिव्य यौवन से *कंचन कलश* है भरा l
नैन बंकिम प्रिये, रस भरे हैं अधर l
बिखरी अलकों के जादू में गहरा असर l
गाल में खूबसूरत भँवर पड़ रहे –
मुस्कुराहट से है रूप जाता निखर l
चाँदनी गेह में स्वर्ण हो तुम खरा l
लग रही तुम शुभे कोई प्यारी ग़ज़ल l
देखकर तुमको दिल मेरा जाता मचल l
श्वास की गंध से मन महकने लगा,
मोतियों की तरह दन्त दिखते धवल l
नित्य सौन्दर्य को कर रही उर्वरा l
पायलों को मिली पाँव से भव्यता l
मिल गई सृष्टि को दृष्टि की नव्यता l
मंजुला,रम्यता श्रेष्ठ पर्याय है,
पा रहे रूप से देव भी दिव्यता l
शुष्क था जो हृदय हो गया अब हरा l
*कृष्ण कुमार श्रीवास्तव ‘कृष्णा’*
हाटा- कुशीनगर
उत्तर प्रदेश
पिनकोड -274203
मो. 9453856390
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*द्वितीय स्थान* कोड – ए
मंत्र पढ़कर शगुन से लिखी पत्रिका,
चल पड़ी लग्न की ले सुखद शुभ घड़ी।
फूल मन में कुमुदिनी से खिलने लगे।
दो नयन स्वप्न में रोज मिलने लगे।
रंग हल्दी का ज्यों तन पे चढ़ने लगा।
त्यों लता-सा ये मन तरु पे बढ़ने लगा।
एक अहसास की बन रही है लड़ी।
कल्पनाओं का सागर हिलोरें लिए।
नाव पर बैठ आया प्रणय रस पिए।
द्वार की साँकलें खटखटाने लगीं।
खुशबुएँ भैरवी राग गाने लगीं।
हाथ में आज मेहँदी को रचाए खड़ी।
द्वार कंचन कलश अब तो सजने लगे।
गीत सौभाग्य के घर में बजने लगे।
सुन के सातों वचन, माँग सिंदूर भर।
सप्तपद से जुड़ा हर जनम का सफर।
संहिता की ऋचा जब हवन में पड़ी।
रचनाकार
*वंदना चौहान*
w/o जितेंद्र सिंह सिकरवार
452/453 जवाहरपुरम
फेज- 3, अलबतिया
शाहगंज,आगरा, उत्तर प्रदेश
पिन कोड -282010
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*तृतीय स्थान* कोड – ऊ
अनाचार और कटु वचनों से,जीवन विषमय कर मत लेना।
कंचन कलश मिला है प्रभु से, इसमें मदिरा भर मत लेना।।
वाणी मिली भजन करने को, निशि-दिन प्रभु का नाम सुमिरना।
चक्षु मिले दर्शन करने को, देव धाम के दर्शन करना।
हाथ मिले हरि के पूजन को, करनी सदा नेक ही रखना,
श्रवण मिले वंदन सुनने को, तो बस अनहद नाद सुमिरना।।
सुगम मार्ग भी दुर्गम कर दे, अपयश की गागर मत लेना।
कंचन कलश मिला है प्रभु से, इसमें मदिरा भर मत लेना।।
करके शमन कामनाओं का, प्रज्वल एक दीप बन देखो।
पीड़ा के मरुथल में भटके, पथिकों हेतु द्वीप बन देखो।
पर भुजंग सा मुख मत रखना, स्वांति हलाहल बन जाएगी,
स्वांति बूंद पीना चाहो तो, कदली और सीप बन देखो।
कहे कबीर सुनो रे मानव!, चादर मैली कर मत लेना।
कंचन कलश मिला है प्रभु से, इसमें मदिरा भर मत लेना।।
फाँके करने पड़ें भले पर, भाई का हक जोड़ न लेना।
माता और पिता दोनों की, सेवा से मुख मोड़ न लेना।
पांच तत्व से बना कलश यह, छठवाँ लेप चढ़ा कंचन का,
क्षिति, जल, पावक, गगन, पवन से, निर्मित घट को फोड़ न लेना।।
राम नाम से पूरित घट में, लालच का घर कर मत लेना।
कंचन कलश मिला है प्रभु से, इसमें मदिरा भर मत लेना।।
पांच चोर ताकें इस तन को, पर वे घेरा लगा न पाएँ।
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह के, दानव फेरा लगा न पाएँ।
तन सेवामय, मन देवालय जैसे तभी बना पाओगे,
सरस सुधा सिंचित रसना में, विषधर डेरा लगा न पाएँ।।
यदि कोई उपकार करो तो, श्रेय स्वयं के सर मत लेना।
कंचन कलश मिला है प्रभु से,इसमें मदिरा भर मत लेना।।
रचनाकार
*सुधीर कुमार मिश्र,*
द्वारा पंकज कुमार तोमर,
नई बस्ती, घिरोर जनपद -मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) पिनकोड -205121
मोबाइल -7906958114
9719206871
आधिकारिक हस्ताक्षर
*प्रोफेसर अजिर बिहारी चौबे*
उपनिदेशक मूल्यांकन/ मुख्य निर्णायक
मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष
एस.आर.के. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फिरोजाबाद ।
*सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं*
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*प्रेषक*
*कृष्ण कुमार “कनक”*
संस्थापक/प्रबंध-सचिव
प्रज्ञा हिंदी सेवार्थ संस्थान ट्रस्ट
मो. 7017646795
*मृदुल माधव पाराशर*
उपाध्यक्ष/प्रतियोगिता प्रभारी
मो. 9528755955
*गौरव चौहान गर्वित*
संस्थापक/मुख्य सचिव
मो.9412500858
*प्रवीण पांडेय*
उपाध्यक्ष
मो. 9808406844
*कुँ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह जादौन*
उपाध्यक्ष/सहनिदेशक- साहित्य
मो. 9897807132
*डॉ. अनुपम शर्मा*
उपाध्यक्ष
मो. 9917570000
*आकाश यादव*
मुख्य व्यवस्थापक
मो. 8791937688
*सचिन कुमार बघेल*
वित्त-सचिव
मो. 8077069829
*मुकुल पाराशर*
मुख्य निदेशक
मो. 9411464129
*यशपाल यश*
अध्यक्ष
मो.9837812637